हौज़ा न्यूज़ एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, क़ुम-ए-मुकद्दसा / भारत देश के जाने-माने सियासी और मज़हबी रहनुमा मौलाना डॉक्टर सय्यद कल्बे रुशैद रिज़वी, जिन्हें मस्जिद-ए-जमकरान में रहबर-ए-मोअज़्ज़म इंकिलाब-ए-इस्लामी आयतुल्लाह अल-उज़्मा सय्यद अली ख़ामनेई की नमाज़-ए-जनाज़ा के अवसर पर अत्यंत निकट से नमाज़ अदा करने की सौभाग्य प्राप्त हुआ। इस अवसर पर उन्होंने हौज़ा न्यूज़ के प्रतिनिधि से बातचीत करते हुए सुप्रीम लीडर की शख्सियत को आलम-ए-इस्लाम और दुनिया भर के मज़लूमों के लिए उम्मीद, इस्तिक़ामत और हक़ की निशानी करार दिया।
मौलाना डॉक्टर सय्यद कल्बे रुशैद रिज़वी ने कहा कि इस ऐतिहासिक महान जनाज़े में शिरकत उनके लिए महज़ एक अवसर नहीं बल्कि एक रूहानी सौभाग्य और गर्व का कारण है। उन्होंने कहा: "मेरे लिए गर्व का सबब सिर्फ यह नहीं कि इस ऐतिहासिक जनाज़े में दुनिया भर से लोग उमड़ आए, बल्कि असली गर्व उस महान नाम पर है जिसे सैयद अली ख़ामनेई कहा जाता है।"
उन्होंने कहा कि इंसान की महानता का मापदंड भीड़ और ज़ाहिरी जलवा नहीं बल्कि हक़ के लिए उसकी साबित-क़दमी है। उनके कहने के अनुसार, हालात अलग भी हो सकते थे और जनाज़े में इतना बड़ा हुजूम भी न होता, लेकिन शिया क़ौम का अक़ीदा हमेशा यही रहा है कि वह ज़ालिम के मुकाबले में मज़लूम के साथ खड़ी होती है।
मौलाना रिज़वी ने वाक़ए-ए-करबला की तरफ़ इशारा करते हुए कहा कि शिया क़ौम उस इमाम हुसैन का मातम करती है जिन्हें करबला की तपती ज़मीन पर बिना गोर-ओ-कफन छोड़ दिया गया था। उन्होंने कहा कि इसी हुसैनी फिक्र की बुनियाद पर शियान-ए-जहाँ हमेशा मज़लूम का साथ देते हैं और ज़ालिम के सामने सर नहीं झुकाते।
उन्होंने सुप्रीम लीडर की जद्दोजहद को ख़िराज-ए-तहसीन पेश करते हुए कहा कि वह गुज़िश्ता कई दहकों से मज़लूमों के हक़ में आवाज़ बुलंद करते रहे और कम उम्री ही से राह-ए-ख़ुदा में इस्तिक़ामत के साथ खड़े रहे। उन्होंने कहा कि सुप्रीम लीडर की ज़िंदगी, फिक्र और जद्दोजहद आने वाली नस्लों के लिए मशाल-ए-राह है।
मौलाना डॉक्टर सय्यद कल्बे रुशैद रिज़वी ने अपने सफ़र का ज़िक्र करते हुए बताया कि वह हिंदुस्तान से एक वफ़द के हमराह इस्लामी जम्हूरिया ईरान पहुँचे। उनके मुताबिक़, मुंबई से तेहरान के लिए ख़ास परवाज़ के ज़रिए लगभग 136 से 138 अफ़राद पर मुश्तमिल वफ़द उनके साथ आया।
उन्होंने हौज़ा-ए-इल्मिया क़ुम और आयतुल्लाह अली रज़ा अराफ़ी, सुप्रीम लीडर के कार्यालय में आयतुल्लाह मोहसिन क़ुमी और भारत देश में नुमाइंदा-ए-वली-ए-फ़क़ीह हुज्जतुल-इस्लाम वल-मुस्लेमीन अब्दुलमजीद हकीम इलाही का शुक्रिया अदा करते हुए कहा कि इन शख्सियतों ने हिंदुस्तानी मेहमानों को मुहब्बत के साथ दावत दी, इंतज़ामात किए और मुख़्तलिफ़ मराहिल में उनकी रहनुमाई की। उन्होंने मस्जिद-ए-जमकरान में नमाज़-ए-जनाज़ा में शिरकत को अपनी ज़िंदगी की बड़ी सौभाग्यता करार दिया।
मौलाना रिज़वी के मुताबिक़, इस अवसर पर दुनिया भर से आए ज़ाइरिन और अक़ीदतमंदों की बड़ी तादाद मौजूद थी। उन्होंने इंतज़ामी उमूर को सराहते हुए कहा कि इतने विशाल इज्तिमा को मुनज़्ज़म करना एक ग़ैर-मामूली ज़िम्मेदारी थी।
उन्होंने हिंदुस्तानी हुकूमत, मुतअल्लिक़ा फ़िज़ाई इदारों और उन तमाम अफ़राद का भी शुक्रिया अदा किया जिन्होंने इस हसास मौक़े पर हिंदुस्तानी शियाओं के सफ़र और शिरकत में तआवुन किया। उन्होंने कहा कि हिंदुस्तान और इस्लामी जम्हूरिया ईरान के ताल्लुक़ात सिर्फ़ सफ़ारती रवाबित तक महदूद नहीं बल्कि हज़ारों साल पुरानी तहज़ीबी, सक़ाफ़ती, इल्मी और इंसानी वाबस्तगियों पर क़ायम हैं।
मौलाना डॉक्टर सय्यद कल्बे रुशैद रिज़वी ने कहा कि हिंदुस्तान की मुख़्तलिफ़ ज़बानों, अदबी रिवायतों और किताबख़ानों में फ़ारसी ज़बान, ईरानी तहज़ीब, शाइरी और इंसानी दोस्ती के गहरे असरात नुमायाँ हैं। उनके अनुसार, हिंदुस्तान और ईरान का ताल्लुक़ मुहब्बत, इल्म, अदब और तहज़ीब का ऐसा मज़बूत रिश्ता है जो हर दौर में और मज़बूत होता रहा है।
उन्होंने कहा कि दुनिया में दो सौ से ज़्यादा मुल्क मौजूद हैं, मगर हिंदुस्तान को यह इज़्ज़त हासिल है कि उसकी सरज़मीन से अहल-ए-बैत की मुहब्बत, हुसैनी फिक्र और ईरान से सक़ाफ़ती ताल्लुक़ात की मज़बूत रिवायत वाबस्ता रही है। उन्होंने रहबर-ए-इंकिलाब-ए-इस्लामी की तरफ़ से हिंदुस्तान और हिंदुस्तानी अवाम के लिए मुहब्बत भरे जज़्बात को भी गर्व का कारण करार दिया।
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